Friday, March 22, 2019

जीवन में समस्या निवारण हेतु अभ्यास आवश्यक

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा  है कि किसी भी कार्य को करने से पहले उसकी तैयारी में जितना समय व्यतीत किया जाएगा जितना अधिक से अधिक समय उसके अभ्यास में व्यतीत किया जाएगा उतनी ही उसकी सफलता की प्रतिशत बढ़ती जाएगी.

यह ठीक उस तरह से है जैसे कि एक दीपक की लौ और तलवार की धार में.  तलवार को धारदार बनने के लिए नुकीला बनने के लिए या फिर तेज बनने के लिए बहुत ही कड़ी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है उसको तपना पड़ता है.  उसको लोहार की चोटो को सहन करना पड़ता है.  तब कहीं जाकर वह एक योग्य और खतरनाक तलवार बन पाती है ठीक इसी तरह से जीवन की आने वाली हर कठिनाई को हमें सकारात्मक ढंग से लेना चाहिए उसमें धैर्य रखते हुए अपने आप को  तपाना चाहिए.  क्योंकि आने वाले जीवन के लिए ऐसी कठिन परिस्थितियां एवं अग्नि परीक्षाएं इंसान को सफलता की ओर ले कर जाती हैं.
अतः जितना अधिक समय अभ्यास में व्यतीत किया जाएगा उतना ही कम समय सफलता को हासिल करने में खर्च होगा. यह ठीक उस तरह से है जैसे कि यह कहना जितना अधिक समय युद्ध से पहले युद्ध कला के कौशल में निपुण होने के अभ्यास के लिए व्यतीत किया जाएगा उतना ही कम रक्त युद्ध के मैदान में बहेगा.

अतः जीवन को सकारात्मक दृष्टि से जीने की कोशिश करनी चाहिए और जीवन में आने वाली हर चुनौती को स्वीकार करना चाहिए.

अजय शर्मा "एकलव्य"
#ajaysharma

Tuesday, March 19, 2019

कृष्ण के जीवन के कुछ रोचक तथ्य

न कोई मरता है और न ही कोई मारता है, सभी निमित्त मात्र हैं...सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे, मरने के उपरांत वे बिना शरीर वाले हो जाएंगे। यह तो बीच में ही शरीर वाले देखे जाते हैं, फिर इनका शोक क्यों करते हो।'-
भगवान श्री कृष्ण

जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे, कृष्ण इनके पास बैठकर इनके प्रवचन सुना करते थे। हालांकि जैन धर्म ने कृष्ण को उनके त्रैषठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो नौ वासुदेव में से एक है।

कृष्ण की प्रेमिका और पत्नियां : कृष्ण के बारे में अक्सर यह कहां जाता है कि उनकी 16 हजार पटरानियां थी। लेकिन यह तथ्‍य गलत है। उनकी मात्र 8 पत्नियां थीं।

कृष्ण की जिन 16 हजार पटरानियों के बारे में कहा जाता है दरअसल वे सभी भौमासर जिसे नरकासुर भी कहते हैं उसके यहां बंधक बनाई गई महिलाएं थीं जिनको श्रीकृष्‍ण मुक्त कराया था। ये महिलाएं किसी की मां थी, किसी की बहिन तो किसी की पत्नियां थी जिनको भौमासुर अपहरण करके ले गया था।

 दरअसल, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गीत गोविंद और जनश्रुतियों में इसका जिक्र है कि राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएं थीं। राधा की कुछ सखियां भी कृष्ण से प्रेम करती थीं जिनके नाम निम्न हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएं थीं जिनके नाम इस तरह हैं- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा। माना जाता है कि ललिता नाम की प्रेमिका को मोक्ष नहीं मिल पाया था, तो बाद में उसने मीरा के नाम से जन्म लिया।

 श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा का जिक्र महाभारत में कहीं भी नहीं मिलता है। इसके अलावा सबसे पुराने हरिवंश और विष्णु पुराण में भी राधा का जिक्र नहीं मिलता। भागवत पुराण में भी राधा का जिक्र नहीं है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के बारे में कहा जाता है कि संभवत: यह चाणक्य या गुप्तकाल में लिखा गया था।

Tuesday, March 12, 2019

उचित फैसले जीवन होगा मंगलमय

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए संपूर्ण ब्रह्मांड से कहते हैं

कोई भी मनुष्य या जीव अपने भविष्य को नहीं देख सकता है फिर भी वह कल्पनाओं, इच्छाओं  और खुशहाल जीवन की आशा लिए वर्तमान में फैसले करता है.

लेकिन भविष्य की आकांक्षा के  साथ वह वर्तमान को योजनाओं को बनाने में व्यतीत कर देता है अतः मनुष्य को अपना अधिकतर समय योजनाओं को बनाने में व्यतीत नहीं करना चाहिए उसको चाहिए कि वह वर्तमान का सुख ले और वर्तमान में लिए गए निर्णय के आधार पर ही भविष्य का निर्माण होता है अतः फैसले सही हो उचित हो जिससे एक अच्छे भविष्य का निर्माण हो. इसका असर परिवार के साथ साथ समाज पर भी पड़ता है कि आपके लिए गए फैसले कैसे थे.

अजय शर्मा "एकलव्य"

Monday, March 11, 2019

संकट का समय है नए अवसरों का समय

श्रीमद् भागवत में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं

हे पार्थ संकट का समय कैसा होता है यह विचार करने योग्य है.

यहां पर संकट का समय कैसा होता है? जिसका अर्थ है:

संकट का समय मनुष्य अपने विचारों,  अपनी आत्मा, अपने मन, अपने ह्रदय को शक्तिशाली बनाने पर केंद्रित करता है. वह संकट के इस समय में अपनी क्षमताओं और सामर्थ्य से ऊपर उठकर जीवन को उन्नत बनाने का प्रयास करता है. वह अपने ज्ञान को समृद्ध बनाने का प्रयास करता है. उसकी विवेकशीलता में आशातीत बढ़ोतरी होती है क्योंकि यही गुण उसको संकट के इस समय में बलवान बनाते हैं जो उसके आने वाले भविष्य के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं.  मनुष्य के जीवन में आया हुआ कष्ट का समय नए अवसरों  का भी गुलदस्ता लेकर आता है.  और यही अवसर   मनुष्य के जीवन को नई दशा और उन्नति की ओर ले कर जाते हैं.  और जो मनुष्य इस कष्ट के समय में नकारात्मक विचारों के समुद्र में डूब जाता है, जो हताशा का शिकार हो जाता है. ऐसे मनुष्य जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते हैं वह सिर्फ हारे हुए व्यक्ति की भांति व्यवहार करते हैं और जीवन को नकारात्मक  भावो  के साथ जीने का प्रयास करते हैं उनके पास कुछ भी ना कर सकने के सैकड़ों बहाने होते हैं भविष्य के लिए.  वे अपने आसपास नकारात्मक विचारों की दुनिया बना लेते हैं और उनके संपर्क में आने वाला हर मनुष्य नकारात्मक विचारों से ग्रसित होने लगता है.  अतः ऐसे मनुष्य से भी दूर रहना चाहिए, जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातें करता हुआ अपनी असफलता के लिए बहाने देता रहे.

अतः पार्थ संकट का समय नए अवसर और अपने आप को मानसिक, शारीरिक स्तर पर समृद्ध बनाने का अवसर होता है जो हमारे आने वाले भविष्य के लिए सुखद होता है.

इसलिए मेरा मानना है कि सभी मनुष्यों को संकट के समय मैं अपने आप पर चिंतन करते हुए प्रत्येक दिशा एवं दशा के साथ समृद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए श्रीमद् भागवत में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश प्रत्येक मानव के लिए विचारणीय है, यदि मनुष्य धैर्य के साथ व्यवहार करें एवं इसे जीवन में उतारने का प्रयास करें तो वह एक सफल एवं खुशहाल जीवन जी सकता है.

आज से ही ऐसे संकट के समय को नए अवसर के रूप में देखते हुए प्रयासरत हो जाएं.
अजय शर्मा " एकलव्य"