मनुष्य जीवन आपसी मतभेदों से भरा हुआ है। जीवन में इतनी विषमताएं हैं कि मन में कटुताएं जन्म ले लेती हैं। विद्वेेषों के प्रहारों के कारण असहिष्णुता, प्रतिशोध और अक्षमा का भाव पैदा होता है लेकिन यह भी शाश्वत सत्य है कि असहिष्णुता, प्रतिशोध और अक्षमा के भावों को ज्यादा लंबे समय तक जी पाना असंभव होता है। मन ऐसे भावों से निजात पाना चाहता है। विचित्र स्थिति बन जाती है जब मन इन दुर्भावों को बचाना भी चाहता है और भगाना भी चाहता है। लेकिन जब इन भावों से छुटकारा पाने का मार्ग नहीं मिलता तो एक विवशता उसे घेर लेती है। ऐसी स्थिति में मानव मन मानसिक संताप से घिर जाता है। सकून और शांति उससे दूर हो जाती है।
जैन धर्म ने ऐसे इच्छुक मन को एक आकार प्रदान किया है- पर्युषण पर्व का, जब वह अपना बोझ हल्का कर सके। वह अपने कट्टर से कट्टर प्रतिरोधी के पास जाकर क्षमा मांग सकता है। अपने जानी दुश्मन को क्षमा दे सकता है। केवल यह कह कर कि आज पर्युषण पर्व है, इसलिए मैं आपको क्षमा करता हूं, आप मुझे क्षमा करें। आज मैं निर्मल भाव से कहता हूं कि मेरी किसी से भी शत्रुता नहीं है। बिना किसी प्रस्तावना के बिना किसी बहाने के केवल पर्युषण के आगमन मात्र से क्षमाभाव का आविर्भाव किया जा सकता है। ये भी संभव है कि कुछ व्यक्ति क्षमा की औपचारिकता ही निभाते हों। वे केवल उनसे क्षमा मांगते हों, जिनसे उनकी प्रतिद्वंद्विता न हो। उनसे क्षमा न मांगते हों, जिनसे उनकी शत्रुता हो।
किंतु मेरा ऐसा मानना है कि ऐसी औपचारिक क्षमा याचनाएं कुछ न कुछ कटुता अवश्य दूर करती ही है। यह ठीक उस तरह से है जैसे कि दो बच्चों में यदि झगड़ा हो जाता है तो बुजुर्ग या बड़े भाई कहते हैं चलो दोनों एक दूसरे से हाथ मिलाओ। जो भी हो, मगर मेरे विचार से ये औपचारिक क्षमा भी कुछ न कुछ कड़वाहट को कम करती ही है। इसलिए जब तक वास्तविक क्षमा तक न पहुंचें, उससे पहले औपचारिक क्षमा का ही आगाज करना चाहिए, और जिस समाज में क्षमा मांगने और क्षमा देने को महोत्सव का रूप दिया जाता है, वह समाज अपने लिए प्रसन्नता और आह्लाद भाव के ऊंचे अंक बटोर लेता है। यही वजह है कि पर्युषण को पर्वाधिराज कहा गया है।
पर्युषण शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। पर्युषण यानी संपूर्ण रूप से अपनी आत्मा के करीब रहना, कर्मजाल को संपूर्ण रूप से नष्ट करना। पर्युषण यानी मन, वचन व कर्म तीन योगों में शांति। अपने कषायों को कम करना और तप से आत्मशुद्धि करना। आत्मा के स्वाभाविक गुणों की रक्षा करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति करने के लिए जैन समाज इन दिनों में धर्म-ध्यान करते हैं। स्वाध्याय करते हैं। गुरुओं से शास्त्र श्रवण करते हैं।
साधु-साध्वियां, श्रावक-श्राविका क्षमतानुसार तपस्या करते हैं। पर्युषण के आठ दिनों का यही ध्येय होता है कि एक व्यक्ति अपने भीतर किसी न किसी तरह क्षमा, सहनशीलता को विकसित कर सकें। देश, समाज को सुख शांति का पर्यावरण प्रदान कर सके।
जैन धर्म ने ऐसे इच्छुक मन को एक आकार प्रदान किया है- पर्युषण पर्व का, जब वह अपना बोझ हल्का कर सके। वह अपने कट्टर से कट्टर प्रतिरोधी के पास जाकर क्षमा मांग सकता है। अपने जानी दुश्मन को क्षमा दे सकता है। केवल यह कह कर कि आज पर्युषण पर्व है, इसलिए मैं आपको क्षमा करता हूं, आप मुझे क्षमा करें। आज मैं निर्मल भाव से कहता हूं कि मेरी किसी से भी शत्रुता नहीं है। बिना किसी प्रस्तावना के बिना किसी बहाने के केवल पर्युषण के आगमन मात्र से क्षमाभाव का आविर्भाव किया जा सकता है। ये भी संभव है कि कुछ व्यक्ति क्षमा की औपचारिकता ही निभाते हों। वे केवल उनसे क्षमा मांगते हों, जिनसे उनकी प्रतिद्वंद्विता न हो। उनसे क्षमा न मांगते हों, जिनसे उनकी शत्रुता हो।
किंतु मेरा ऐसा मानना है कि ऐसी औपचारिक क्षमा याचनाएं कुछ न कुछ कटुता अवश्य दूर करती ही है। यह ठीक उस तरह से है जैसे कि दो बच्चों में यदि झगड़ा हो जाता है तो बुजुर्ग या बड़े भाई कहते हैं चलो दोनों एक दूसरे से हाथ मिलाओ। जो भी हो, मगर मेरे विचार से ये औपचारिक क्षमा भी कुछ न कुछ कड़वाहट को कम करती ही है। इसलिए जब तक वास्तविक क्षमा तक न पहुंचें, उससे पहले औपचारिक क्षमा का ही आगाज करना चाहिए, और जिस समाज में क्षमा मांगने और क्षमा देने को महोत्सव का रूप दिया जाता है, वह समाज अपने लिए प्रसन्नता और आह्लाद भाव के ऊंचे अंक बटोर लेता है। यही वजह है कि पर्युषण को पर्वाधिराज कहा गया है।
पर्युषण शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। पर्युषण यानी संपूर्ण रूप से अपनी आत्मा के करीब रहना, कर्मजाल को संपूर्ण रूप से नष्ट करना। पर्युषण यानी मन, वचन व कर्म तीन योगों में शांति। अपने कषायों को कम करना और तप से आत्मशुद्धि करना। आत्मा के स्वाभाविक गुणों की रक्षा करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति करने के लिए जैन समाज इन दिनों में धर्म-ध्यान करते हैं। स्वाध्याय करते हैं। गुरुओं से शास्त्र श्रवण करते हैं।
साधु-साध्वियां, श्रावक-श्राविका क्षमतानुसार तपस्या करते हैं। पर्युषण के आठ दिनों का यही ध्येय होता है कि एक व्यक्ति अपने भीतर किसी न किसी तरह क्षमा, सहनशीलता को विकसित कर सकें। देश, समाज को सुख शांति का पर्यावरण प्रदान कर सके।