Thursday, September 8, 2016

पर्युषण

मनुष्य जीवन आपसी मतभेदों से भरा हुआ है। जीवन में इतनी विषमताएं हैं कि मन में कटुताएं जन्म ले लेती हैं। विद्वेेषों के प्रहारों के कारण असहिष्णुता, प्रतिशोध और अक्षमा का भाव पैदा होता है लेकिन यह भी शाश्वत सत्य है कि असहिष्णुता, प्रतिशोध और अक्षमा के भावों को ज्यादा लंबे समय तक जी पाना असंभव होता है। मन ऐसे भावों से निजात पाना चाहता है। विचित्र स्थिति बन जाती है जब मन इन दुर्भावों को बचाना भी चाहता है और भगाना भी चाहता है। लेकिन जब इन भावों से छुटकारा पाने का मार्ग नहीं मिलता तो एक विवशता उसे घेर लेती है। ऐसी स्थिति में मानव मन मानसिक संताप से घिर जाता है। सकून और शांति उससे दूर हो जाती है।

जैन धर्म ने ऐसे इच्छुक मन को एक आकार प्रदान किया है- पर्युषण पर्व का, जब वह अपना बोझ हल्का कर सके। वह अपने कट्टर से कट्टर प्रतिरोधी के पास जाकर क्षमा मांग सकता है। अपने जानी दुश्मन को क्षमा दे सकता है। केवल यह कह कर कि आज पर्युषण पर्व है, इसलिए मैं आपको क्षमा करता हूं, आप मुझे क्षमा करें। आज मैं निर्मल भाव से कहता हूं कि मेरी किसी से भी शत्रुता नहीं है। बिना किसी प्रस्तावना के बिना किसी बहाने के केवल पर्युषण के आगमन मात्र से क्षमाभाव का आविर्भाव किया जा सकता है। ये भी संभव है कि कुछ व्यक्ति क्षमा की औपचारिकता ही निभाते हों। वे केवल उनसे क्षमा मांगते हों, जिनसे उनकी प्रतिद्वंद्विता न हो। उनसे क्षमा न मांगते हों, जिनसे उनकी शत्रुता हो।

किंतु मेरा ऐसा मानना है कि ऐसी औपचारिक क्षमा याचनाएं कुछ न कुछ कटुता अवश्य दूर करती ही है। यह ठीक उस तरह से है जैसे कि दो बच्चों में यदि  झगड़ा हो जाता है तो बुजुर्ग या बड़े भाई कहते हैं चलो दोनों एक दूसरे से हाथ मिलाओ। जो भी हो, मगर मेरे विचार से ये औपचारिक क्षमा भी कुछ न कुछ कड़वाहट को कम करती ही है। इसलिए जब तक वास्तविक क्षमा तक न पहुंचें, उससे पहले औपचारिक क्षमा का ही आगाज करना चाहिए, और जिस समाज में क्षमा मांगने और क्षमा देने को महोत्सव का रूप दिया जाता है, वह समाज अपने लिए प्रसन्नता और आह्लाद भाव के ऊंचे अंक बटोर लेता है। यही वजह है कि पर्युषण को पर्वाधिराज कहा गया है।

पर्युषण शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। पर्युषण यानी संपूर्ण रूप से अपनी आत्मा के करीब रहना, कर्मजाल को संपूर्ण रूप से नष्ट करना। पर्युषण यानी मन, वचन व कर्म तीन योगों में शांति। अपने कषायों को कम करना और तप से आत्मशुद्धि करना। आत्मा के स्वाभाविक गुणों की रक्षा करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति करने के लिए जैन समाज इन दिनों में धर्म-ध्यान करते हैं। स्वाध्याय करते हैं। गुरुओं से शास्त्र श्रवण करते हैं।
साधु-साध्वियां, श्रावक-श्राविका क्षमतानुसार तपस्या करते हैं। पर्युषण के आठ दिनों का यही ध्येय होता है कि एक व्यक्ति अपने भीतर किसी न किसी तरह क्षमा, सहनशीलता को विकसित कर सकें। देश, समाज को सुख शांति का पर्यावरण प्रदान कर सके।

उर्स बोले तो आत्मा का परमात्मा से निकाह का जश्न


अजय शर्मा
सूफी विचार धारा में अमीर खुसरो कितने लोकप्रिय हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। सूफी विचारधारा ने हर धर्म, हर मजहब और हर कौम के लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। जो लोग इसके बारे में अच्छी तरह से नहीं जानते हैं वे इसे जानने की जिज्ञासा रखते हैं। इसी जिज्ञासा के भाव को शांत करने के लिए हम आपको बताने जा रहे हैं उर्स के बारे में।

सूफी मत परम्परा में जब किसी सूफी, दरवेश या पीर की मृत्यु हो जाती है तो उसे विसाल कहते हैं। सूफियों के इस विसाल को उनके मुरीद एक उत्सव के तौर पर उर्स के नाम से मनाते हैं। उर्स अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है आत्मा का परमात्मा से निकाह या विवाहोत्सव यानी रूहानी शादी का जश्न। कुछ सूफी साधकों की मान्यता है कि जब किसी सूफी दरवेश की आत्मा अपने मलिन जिस्म या शरीर का त्याग करती है, तब उसका विवाह या मिलन परम पुनीत परमात्मा से होता है और वह दो से एक में तब्दील हो जाते हैं।

हम साधारण सांसारिक भौतिकवादी-दुनियावी लोगों में यह मान कर दुख प्रकट किया जाता है कि हमारा कोई प्रियजन हमें छोड़ कर इस दुनिया से चला गया है, जबकि हम सभी यह जानते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अनश्वर। उर्स का अर्थ शादी, जश्न और लंगर है। उर्स के दिन सूफी की मजार के पास खूब जश्न और उत्सव मनाया जाता है और मेला लगता है। साल भर में यह एक बार होता है। उर्स के दिन जा कर लोग व मुरीद बड़े भक्ति भाव से उस सूफी दरवेश की मजार या समाधि के नजदीक फातिहा पढ़ते हैं और सम्पूर्ण कुरान का पाठ किया जाता है।    
सूफियों के मकबरों के संबंध में एक हदीस का हवाला दिया जाता है कि श्अगर तुम्हारा हृदय शोक संतृप्त हो तो पवित्र आत्माओं की कब्रों के पास जाओ और शांति की खोज करो। सूफियों की मजारों के दर्शन के लिए जो लोग जाते हैं, उसे जियारत कहते हैं। लोगों का विश्वास है कि परमात्मा के विशेष प्रेमपात्र होने के कारण ये सूफी कभी मरते नहीं। ये मरने के बाद भी अपनी कब्र या मजार में जिंदा रहते हैं। इसीलिए सूफी संतों को जिन्दा पीर भी कहा जाता है। इसीलिए कोई जरूरी नहीं है कि जिस पीर या  सूफी की पूजा लोग उसके जीवन काल में करते हैं, उसे उसकी मृत्यु के बाद छोड़ दें।

अणुव्रत दर्शन क्या है


अजय शर्मा
अणुव्रत दर्शन कहता है कि अणुव्रत आंदोलन ज्ञान और साधना का आंदोलन है। इसमें साधना की प्रधानता है। अणुव्रत समाज में आपसी सहयोग और सहिष्णुता के साथ साथ नैतिक चरित्र के उत्थान पर अधिक बल देता है। मनुष्य व्यक्ति और सामाजिक दोनों रूप में अवस्थित है। समाज की अपेक्षा श्रृंखला है और वहीं हिंसा, असत्य, चैर्य, अब्रहमचर्य और परिग्रह का उदगम हेतू है। पूर्णता की ओर बढ़ने का मार्ग है अपेक्षाओं का संयम। अपेक्षाओं के संयम का अर्थ है हिंसा, असत्य, चैर्य, अब्रहमचर्य और परिग्रह का संयम।

संयम का अर्थ है उस व्यक्तित्व का विकास, जो बाहय से निरपेक्ष होकर अपने आप में परिपूर्ण, संतुष्ट और परितृप्त है। निरपेक्षता की स्थिति ध्यान की साधना के द्वारा प्राप्त हो सकती है। अति सापेक्षता की स्थिति ध्यान की साधना से शून्य व्यक्ति में होती है। तीसरी स्थिति ध्यान की मध्यम साधना से प्राप्त की जा सकती है। उसमें अपेक्षाएं रहती हैं। पर निरंकुश नहीं। इस संस्कारधारा में हिंसा, हिंसा, असत्य, चैर्य, अब्रहमचर्य और परिग्रह की प्रवृत्ति सीमित हो जाती है। यही अणुव्रत दर्शन है।