Friday, December 9, 2016

डरें नहीं, चुनौतियों से निपटे



जीने की राह
अगर आप सालों से एक नौकरी पर हैं और अचानक आपके काम का स्वभाव बदल जाता है, तो आप कहीं न कहीं यह मानने लगते हैं कि आपकी पदावनति हुई है। अगर इससे ऊपर उठ कर सोचें तो आप इस स्थिति का फायदा भी उठा सकते हैं।

ओशो कहते थे, ‘किसी भी उम्र में नया सीखने की इच्छा या अपने आपको नए तरह से पेश करना एक कला है। जिस तरह एक बच्चा अपनी शुरुआती शिक्षा में हर नई बात सीखने को उत्सुक रहता है, उस तरह एक वयस्क को भी हर हाल में नयेपन को आत्मसात करने की आदत डालनी चाहिए।’

डर से डरें नहीं
विजेता- हर विजेता के पास अपने आगे आने और चुनौतियों से निपटने की एक कहानी होती है। डर उन्हें भी लगता है। पर वे जल्दी से उसका मुकाबला करना सीख लेते हैं।
अपने आपको पहचानें-अगर आपके सामने ऐसी स्थिति आ गई है, तो उससे बचने के बजाय अपने अंदर झांकें। क्या आप यह काम कर पाएंगे? दोस्तों व विशेषज्ञों की सलाह लें। पर अंततरू करें वही, जो दिल कहे।

जीवन में जागरूकता का महत्व



जीने की राह
समस्याएं हमारी जागरूकता की कमी का नतीजा होती हैं और समाधान आंतरिक रूप से जागरूक होने के बाद मिलते हैं। जिंदगी के हर आयाम को बेहतर बनाने के लिए भीतर से सजग होना बेहद जरूरी है।
पिछले कई सालों से मैं दुनियाभर के लोगों के सवालों और पशोपेश को हल करने की कोशिश कर रहा हूं। ये सवाल अलग-अलग देश के लोगों के हैं, पर पैदा एक ही जगह से हो रहे हैं। मन के भीतर पैदा हुए असमंजस और अंधेरे के कारण ही ये सवाल पैदा होते हैं। मैंने यह महसूस किया है

कि भले ही लोगों की परेशानियां अलग-अलग हों, पर इनका कारण एक ही है। लोग दुखी हैं, दर्द में हैं तो इसलिए, क्योंकि वो पूरी तरह से सजग नहीं हैं। वे संकुचित मानसिकता के जाल में फंसे हुए हैं। इस मनोस्थिति में एक कदम भी आगे बढ़ाना उनके लिए किसी लड़ाई लड़ने से कम नहीं है। जिंदगी में परेशानी पैदा ही इसलिए होती है, क्योंकि हम वो करते हैं जो हमारे लिए प्रभावी साबित नहीं हो सकते। इस नाकामी से निराशा बढ़ती जाती है और ऊर्जा कम होती जाती है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा भी है, किसी भी समस्या का हल सजगता के उस स्तर पर नहीं मिल सकता है, जिस स्तर पर वह परेशानी पैदा हुई है। यानी जिंदगी के उलझे सवालों के जवाब खुद को पहले से ज्यादा सजग बनाकर ही पाए जा सकते हैं। जब सजगता बढ़ती है तो डर खत्म होता है, मन में नए विचार आते हैं और जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए जगह मिलती है। अपने अहंकार को अपनी जिंदगी की कमान सौंपने की जगह हम अपने असली स्वरूप को जिंदगी की चाबी दे देते हैं। हमारी आंतरिक शांति, शुद्धता और ज्ञान हमारी जिंदगी को दिशा देने लगते हैं। इस विकास क्रम में हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, संपूर्ण सजगता हमारी पहुंच में आने लगती है। इस स्थिति में कोई समस्या हमारे लिए मायने नहीं रखती। संभावनाओं के अनंत द्वार खुल जाते हैं। संघर्ष खत्म हो जाते हैं, इच्छाएं अपने आप पूरी हो जाती हैं। हमें ऐसा महसूस होता है कि जागरूकता के इस स्तर तक पहुंचने में लंबा समय लग जाएगा, जबकि सच्चाई यह है कि संपूर्ण सजगता हर पल हमें सही दिशा दिखाने की कोशिश करती है, बशर्ते आप उस संदेश को समझ सकें।

जागरूकता के तीन पड़ाव
आंतरिक सजगता के तीन पड़ावों को समझकर खुद की खोज की आपकी राह थोड़ी आसान हो जाएगी। मान लीजिए आप एक अंधेरे कमरे में चल रहे हैं और रोशनी के लिए आपके पास एक मोमबत्ती भर है। आप कमरे में रखे सामानों से टकराएंगे। खुद को अलग-थलग महसूस करेंगे। इसे संकुचित सजगता कहते हैं। अब कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में किसी ने फ्लैश लाइट थमा दी है। अब आपको कोई डर नहीं है। अब तक जो बाधाएं नजर आ रही थीं, उनका उद्देश्य भी समझ पा रहे हैं। सोफा नजर आ रहा है, जिस पर आप बैठ सकते हैं। किताबें नजर आ रही हैं, जिन्हें आप पढ़ सकते हैं। म्यूजिक सिस्टम नजर आ रहा है,
जिससे आप गाने सुन सकते हैं। यानी कुछ समय पहले तक जो चीजें आपके लिए बाधा थीं, वही अब मौके में तब्दील हो गई हैं। आप एक चीज को दूसरी चीज से आसानी से जोड़ पाएंगे। इसे विस्तृत सजगता कहते हैं।
अब कल्पना कीजिए कि इस बार वह कमरा, उसकी दीवारें, फ्लोर और यहां तक कि छत भी शीशे की बनी हुई है। पूरा कमरा सूरज की रोशनी से भरा हुआ है। अब आप बाहर देखेंगे तो महसूस करेंगे कि आपके पास अवसरों की कोई कमी नहीं है। पूरी दुनिया आपका मंच है। यही आपका पूरी तरह से सजग होना है। अब आपके सामने कोई समस्या नहीं है, इसलिए उसके हल तलाशने की जरूरत भी नहीं है। अब आपको जिंदगी में एक प्रवाह नजर आएगा और उसे आप अपने इशारों पर नचा पाएंगे।    


आध्यात्मिक साधना केवल संन्यासी लोग करेंगे



बहुत से लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिक साधना केवल संन्यासी लोग करेंगे, यह बात बिल्कुल गलत है। संन्यासी और गृहस्थ में मूल अंतर यह है कि गृहस्थ के दो कर्तव्य हो जाते हैं। संन्यासी का एक ही कर्तव्य रहता है। गृहस्थ को अपने परिवार का पालन-पोषण करना होता है। स्त्री, पुत्र और परिजनों की देखभाल करनी होती है। यह हुआ एक कर्तव्य और दूसरा कर्तव्य है- इस पृथ्वी के अखंड मानव समाज के कल्याण हेतु कुछ करना पड़ता है।

इस द्वितीय कर्तव्य को खूब संभाल कर संतुलित रूप से करना होगा। परिवार के लिए भी थोड़ा-बहुत जो करणीय है, करना होगा। दोनों ओर संतुलन बना कर चलना पड़ेगा।

शिव जी की एक कथा है। एक दिन वे दोपहर को आकर पार्वती से बोल, श्भोजन दो।श् पार्वती जी ने कहा, श्आप भोजन तो मांग रहे हो, किंतु घर-गृहस्थी की भी कुछ खबर रखते हो? आप तो बाहर एक श्मशान से दूसरे श्मशान घूमते रहते हो। घर का दायित्व तो मुझे ही पूरा करना पड़ता है। आप शायद नहीं जानते कि आज तो चूल्हा ही नहीं जला और न ही हांडी चढ़ी। आज भोजन नहीं बना, क्योंकि आज घर में कुछ था ही नहीं, न चावल, न दाल। इसलिए आज रसोई नहीं बनी तो भोजन नहीं मिलेगा। तब शिव जी ने कहा, श्ऐसा है तो एक काम करो मांड़-भात बना दो।श् तब पार्वती ने कहा, श्आप क्या कह रहे हैं? मांड़-भात के लिए भी

तो चावल चाहिए। तब शिव जी ने कहा, श्बहुत दिन पहले मैं भिक्षा मांग कर बहुत सा चावल और दाल लाया था, वह सब कहां गया? पार्वती जी ने उत्तर दिया, सब समाप्त हो गया। भंडार में छह पल्ला धान रखा था, जिसे गणेश जी के चूहे ने जलपान के रूप में खा लिया। आप तो कुछ देखते नहीं, इसीलिए नहीं जानते। इसलिए इस विषय में स्त्रियों को दोष देना ठीक नहीं।श्
याद रखो कि छोटे और बड़े संसार दोनों में एक संतुलन रखना होता है और उसको संभाल कर चलना पड़ता है। यह संतुलन गृहस्थ का कर्तव्य है, संन्यासी का नहीं। संन्यासी के पास जो भी कुछ आता है, वृहत् संसार के लिए वह दान कर देगा। अपना समय भी देगा और जो कुछ अस्थायी सम्पदा होगी, सब दान कर देगा। संन्यासी की कोई स्थायी सम्पत्ति तो होती नहीं है, सब कुछ दान कर देना ही संन्यासी का कर्र्तव्य है। तो गृहस्थ और संन्यासी के जीवन के ऐसे ही नियम हैं।

इसके पहले जो मैंने कहा था कि मनुष्य को सभी अवस्थाओं में, सभी उम्रों में धर्म साधना करनी ही होगी। सब लोग अपने कर्तव्य करते जाओ। देखना, यह जो पृथ्वी हैं, इसी में तुम लोग स्वर्ग को उतार कर ला सकोगे। अन्य किसी स्वर्ग की खोज में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। आज से समुचित भाव से अपने आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक कर्तव्य का पालन करते रहो।