अजय शर्मा
सूफी विचार धारा में अमीर खुसरो कितने लोकप्रिय हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। सूफी विचारधारा ने हर धर्म, हर मजहब और हर कौम के लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। जो लोग इसके बारे में अच्छी तरह से नहीं जानते हैं वे इसे जानने की जिज्ञासा रखते हैं। इसी जिज्ञासा के भाव को शांत करने के लिए हम आपको बताने जा रहे हैं उर्स के बारे में।
सूफी मत परम्परा में जब किसी सूफी, दरवेश या पीर की मृत्यु हो जाती है तो उसे विसाल कहते हैं। सूफियों के इस विसाल को उनके मुरीद एक उत्सव के तौर पर उर्स के नाम से मनाते हैं। उर्स अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है आत्मा का परमात्मा से निकाह या विवाहोत्सव यानी रूहानी शादी का जश्न। कुछ सूफी साधकों की मान्यता है कि जब किसी सूफी दरवेश की आत्मा अपने मलिन जिस्म या शरीर का त्याग करती है, तब उसका विवाह या मिलन परम पुनीत परमात्मा से होता है और वह दो से एक में तब्दील हो जाते हैं।
हम साधारण सांसारिक भौतिकवादी-दुनियावी लोगों में यह मान कर दुख प्रकट किया जाता है कि हमारा कोई प्रियजन हमें छोड़ कर इस दुनिया से चला गया है, जबकि हम सभी यह जानते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अनश्वर। उर्स का अर्थ शादी, जश्न और लंगर है। उर्स के दिन सूफी की मजार के पास खूब जश्न और उत्सव मनाया जाता है और मेला लगता है। साल भर में यह एक बार होता है। उर्स के दिन जा कर लोग व मुरीद बड़े भक्ति भाव से उस सूफी दरवेश की मजार या समाधि के नजदीक फातिहा पढ़ते हैं और सम्पूर्ण कुरान का पाठ किया जाता है।
सूफियों के मकबरों के संबंध में एक हदीस का हवाला दिया जाता है कि श्अगर तुम्हारा हृदय शोक संतृप्त हो तो पवित्र आत्माओं की कब्रों के पास जाओ और शांति की खोज करो। सूफियों की मजारों के दर्शन के लिए जो लोग जाते हैं, उसे जियारत कहते हैं। लोगों का विश्वास है कि परमात्मा के विशेष प्रेमपात्र होने के कारण ये सूफी कभी मरते नहीं। ये मरने के बाद भी अपनी कब्र या मजार में जिंदा रहते हैं। इसीलिए सूफी संतों को जिन्दा पीर भी कहा जाता है। इसीलिए कोई जरूरी नहीं है कि जिस पीर या सूफी की पूजा लोग उसके जीवन काल में करते हैं, उसे उसकी मृत्यु के बाद छोड़ दें।
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