अजय शर्मा
अणुव्रत दर्शन कहता है कि अणुव्रत आंदोलन ज्ञान और साधना का आंदोलन है। इसमें साधना की प्रधानता है। अणुव्रत समाज में आपसी सहयोग और सहिष्णुता के साथ साथ नैतिक चरित्र के उत्थान पर अधिक बल देता है। मनुष्य व्यक्ति और सामाजिक दोनों रूप में अवस्थित है। समाज की अपेक्षा श्रृंखला है और वहीं हिंसा, असत्य, चैर्य, अब्रहमचर्य और परिग्रह का उदगम हेतू है। पूर्णता की ओर बढ़ने का मार्ग है अपेक्षाओं का संयम। अपेक्षाओं के संयम का अर्थ है हिंसा, असत्य, चैर्य, अब्रहमचर्य और परिग्रह का संयम।
संयम का अर्थ है उस व्यक्तित्व का विकास, जो बाहय से निरपेक्ष होकर अपने आप में परिपूर्ण, संतुष्ट और परितृप्त है। निरपेक्षता की स्थिति ध्यान की साधना के द्वारा प्राप्त हो सकती है। अति सापेक्षता की स्थिति ध्यान की साधना से शून्य व्यक्ति में होती है। तीसरी स्थिति ध्यान की मध्यम साधना से प्राप्त की जा सकती है। उसमें अपेक्षाएं रहती हैं। पर निरंकुश नहीं। इस संस्कारधारा में हिंसा, हिंसा, असत्य, चैर्य, अब्रहमचर्य और परिग्रह की प्रवृत्ति सीमित हो जाती है। यही अणुव्रत दर्शन है।
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