Friday, December 9, 2016

आध्यात्मिक साधना केवल संन्यासी लोग करेंगे



बहुत से लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिक साधना केवल संन्यासी लोग करेंगे, यह बात बिल्कुल गलत है। संन्यासी और गृहस्थ में मूल अंतर यह है कि गृहस्थ के दो कर्तव्य हो जाते हैं। संन्यासी का एक ही कर्तव्य रहता है। गृहस्थ को अपने परिवार का पालन-पोषण करना होता है। स्त्री, पुत्र और परिजनों की देखभाल करनी होती है। यह हुआ एक कर्तव्य और दूसरा कर्तव्य है- इस पृथ्वी के अखंड मानव समाज के कल्याण हेतु कुछ करना पड़ता है।

इस द्वितीय कर्तव्य को खूब संभाल कर संतुलित रूप से करना होगा। परिवार के लिए भी थोड़ा-बहुत जो करणीय है, करना होगा। दोनों ओर संतुलन बना कर चलना पड़ेगा।

शिव जी की एक कथा है। एक दिन वे दोपहर को आकर पार्वती से बोल, श्भोजन दो।श् पार्वती जी ने कहा, श्आप भोजन तो मांग रहे हो, किंतु घर-गृहस्थी की भी कुछ खबर रखते हो? आप तो बाहर एक श्मशान से दूसरे श्मशान घूमते रहते हो। घर का दायित्व तो मुझे ही पूरा करना पड़ता है। आप शायद नहीं जानते कि आज तो चूल्हा ही नहीं जला और न ही हांडी चढ़ी। आज भोजन नहीं बना, क्योंकि आज घर में कुछ था ही नहीं, न चावल, न दाल। इसलिए आज रसोई नहीं बनी तो भोजन नहीं मिलेगा। तब शिव जी ने कहा, श्ऐसा है तो एक काम करो मांड़-भात बना दो।श् तब पार्वती ने कहा, श्आप क्या कह रहे हैं? मांड़-भात के लिए भी

तो चावल चाहिए। तब शिव जी ने कहा, श्बहुत दिन पहले मैं भिक्षा मांग कर बहुत सा चावल और दाल लाया था, वह सब कहां गया? पार्वती जी ने उत्तर दिया, सब समाप्त हो गया। भंडार में छह पल्ला धान रखा था, जिसे गणेश जी के चूहे ने जलपान के रूप में खा लिया। आप तो कुछ देखते नहीं, इसीलिए नहीं जानते। इसलिए इस विषय में स्त्रियों को दोष देना ठीक नहीं।श्
याद रखो कि छोटे और बड़े संसार दोनों में एक संतुलन रखना होता है और उसको संभाल कर चलना पड़ता है। यह संतुलन गृहस्थ का कर्तव्य है, संन्यासी का नहीं। संन्यासी के पास जो भी कुछ आता है, वृहत् संसार के लिए वह दान कर देगा। अपना समय भी देगा और जो कुछ अस्थायी सम्पदा होगी, सब दान कर देगा। संन्यासी की कोई स्थायी सम्पत्ति तो होती नहीं है, सब कुछ दान कर देना ही संन्यासी का कर्र्तव्य है। तो गृहस्थ और संन्यासी के जीवन के ऐसे ही नियम हैं।

इसके पहले जो मैंने कहा था कि मनुष्य को सभी अवस्थाओं में, सभी उम्रों में धर्म साधना करनी ही होगी। सब लोग अपने कर्तव्य करते जाओ। देखना, यह जो पृथ्वी हैं, इसी में तुम लोग स्वर्ग को उतार कर ला सकोगे। अन्य किसी स्वर्ग की खोज में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। आज से समुचित भाव से अपने आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक कर्तव्य का पालन करते रहो।

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